भारत मे दो प्रति है मनुस्मृति कि कूच मे विक्षेप है ओ तोड मरोड कर पेश कि गायी है
मनुस्मृति भारत की न्याय व्यवस्था का ग्रन्थ था , जिसको अंग्रेजो ने अपने हिसाब से बहुत सारी घटिया बाते डाल दी ताकि वोह कई आने वाली पीढियों तक भारत को मानसिक गुलाम बना सके।
राजीव दिक्षित
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सुना है , मनुस्मृति को जलाया गया !
! उलटे ,जलाने से हुआ क्या ? क्या पुस्तक का अस्तित्व मिट गया ? नहीं ! चलो, अच्छा ही हुआ की पुस्तक अभी ओर चर्चा में आ गयी ! क्योंकि यकीन से कह सकता हूँ की जलाने वालो ने इसे नहीं पढ़ा होगा ! अगर थोडा भी पढ़ा होता तो उस पर बात करते, जलाते नहीं !
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जाने राजीव भाई क्या बोलते है मनुस्मृति के बरे मे,
क्योंकि हमारे यहाँ धर्म के 10 लक्षण है जो धारण करे वो धार्मिक है ,यहाँ मंदिर मे आकर घंटा बजाना कर्मकांड है धर्म नहीं ! धर्म तो धारण करने वाले 10 लक्षणो के आधार पर चलता है वो 10 लक्षण (मनुसमृति) मे बहुत स्पष्ट दिये है की धर्म क्या है !भारतीयता क्या है इसको पहचानते हों, कम से कम धर्म के दस लक्षण उन्हें मालूम हो( धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शौच (स्वच्छता), इन्द्रियों को वश मे रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना; ये धर्म के दस लक्षण हैं।) जो व्यक्ति उसको धारण करे वो धार्मिक है वो हिन्दू हो मुसलमान हो ईसाई हो पारसी हो इससे कोई लेना देना नहीं !! जो उन लक्षणो को धारण करे वो धार्मिक है ये हमारी परिभाषा है
जो व्यक्ति उसको धारण करे वो धार्मिक है वो हिन्दू हो मुसलमान हो ईसाई हो पारसी हो इससे कोई लेना देना नहीं !! जो उन लक्षणो को धारण करे वो धार्मिक है ये हमारी परिभाषा है !
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(मनुसमृति) मे बिलकुल स्पष्ट परिभाषा है और इतनी सुंदर परिभाषा है की कोई दे नहीं सकता और पूरे ब्रह्मांड के लिए वही परिभाषा है केवल मनुष्य के लिए नहीं ,पशु पक्षी ,कीड़े मकोड़े ,चींटी हाथी सबके लिए वही परिभाषा है ! तो हमारे यहाँ की परिभाषा के अनुसार धर्म के निरपेक्ष आप चले जाए तो ये दुनिया ही नहीं चलेगी तो भारत मे तो धर्मनिरपेक्ष कुछ नहीं हो सकता यहाँ कुछ हो सकता है तो वो पंथनिरपेक्ष हो सकता है ,की सरकार पंथनिरपेक्ष है इस पंथ का भी नहीं मानती उस पंथ का भी नहीं मानती ! संप्रदाय निरपेक्ष हो सकता है की सरकार इस संप्रदाय का भी नहीं मानती ! उस संप्रदाय का भी नहीं मानती ! तो धर्मनिरपेक्ष होना तो संभव ही नहीं है भारत के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया मे किसी के लिए भी नहीं !!
ईसाईयत भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकती है क्योंकि डूब जाएगा सब कुछ ! इस्लाम भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता क्योंकि खत्म हो जाएगा सब कुछ ! धर्मनिरपेक्ष तो दुनिया मे कुछ नहीं हो सकता है जो है वो धर्म के सापेक्ष ही हो सकता है ! निरपेक्ष तो कुछ नहीं हो सकता ! पंथ निरपेक्ष कुछ हो सकता है संप्रदाय निरपेक्ष कुछ हो सकता है ! लेकिन हमारे नेताओ को तो ये बात करते भी डर लगता है या तो डरपोक है या मूर्ख है !!
मुझे लगता है उनमे मूर्खता की पराकाष्ठा ज्यादा है ! थोड़ी कमजोरी हो सकती है लेकिन मूर्खता की पराकाष्ठा ज्यादा है !!
(मनुसमृति) मे बिलकुल स्पष्ट परिभाषा है
http:// eksochjoalagho.blogspot.ae/ 2016/03/ manusmriti-anbedkr-criticis m.html?m=1
मनुस्मृति पर डॉ. आंबेडकर के विचार का कठोर आलोचना
मनुस्मृति का मूल विषय वेदानुकूल वर्णाश्रम धर्म का विधि-विधान है। इसमें संपूर्ण मानव धर्म है। दूसरे शब्दों में मनुस्मृति एक कानूनी समाजशास्त्र है। इसमें एक ओर मनुष्य के आचरण को लेकर मर्यादा और नैतिक कर्तव्य दिए गए हैं,तो दूसरी ओर समाज व्यवस्था को चलाने के लिए क़ानून,दण्ड,प्रायश्चित आदि का भी समावेश है। एक तरह से कहा जाए तो आधुनिक समाज के संविधान के भाँती मनुस्मृति प्राचीन समाज में 'क़ानून का शासन' स्थापित करता था,जिसके बदौलत राजा और प्रजा दोनों को ही अनुशासित किया जाता था।
आधुनिक भारत के एक दलित विचारक डॉ. आंबेडकर द्वारा इस किताब की तीखी आलोचना की गयी,गुस्से में आकर उनके द्वारा जला भी दिया गया,इन दिनों उसी का प्रचलन हो रहा है और जगह-जगह 'मनुस्मृति' को समझे बिना जलाने की ड्रामेवाजी चल रही है।
डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति पर जो भी विचार व्यक्त कियें हैं,उसमें उन्होंने 475 श्लोकों का बार-बार प्रयोग किया,जिनमें से अधिकांश मिलावटी है,अगर इसे निकाल दिया जाए तो मनु के चिंतन और आंबेडकर के चिंतन में कोई मतभेद नहीं रह जाता।
अपने किताब 'शूद्रों की खोज' में आंबेडकर लिखते हैं,"मैं संस्कृत भाषा का पारंगत नहीं हूँ तो अपनी इस कमजोरी को मैं स्वीकार करता हूँ।"
इसीकारण दुर्भाग्यवश डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति के विषय में वेद विरोधी मैक्समूलर द्वारा संपादित और जॉर्ज बूहलर द्वारा अंगरेजी में अनुवादित मनुस्मृति के आधार पर अपना विचार लिख दिया,जिससे अनेक भ्रांतियाँ हुयी। मैक्समूलर और बूहलर के भारतीय संस्कृति विरोध के पूर्वाग्रह को कई वामपंथी इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं।
मनु के धर्मशास्त्र का मुख्य विषय वर्णाश्रम धर्म है,लेकिन डॉ. आंबेडकर द्वारा दुर्भाग्य से वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के रूप में समझ लिया जाता है। इसपर वे कहते हैं,'मनु ने चारों वर्णों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं क्यों दी ? एक समान क्यों नहीं दी ?"
यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि मनुस्मृति में सभी मनुष्यों के लिए एक सामान्य धर्म,और प्रत्येक वर्ण के लिए उसका विशेष धर्म कहा गया है। जो स्वाभाविक है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य के गुण,कर्म और स्वभाव में भिन्नता पायी जाती है। सभी मनोवैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं और आधुनिक शोधों द्वारा इसे प्रमाणित भी किया जा चुका है कि सभी मनुष्य में भिन्नता पायी जाती है।
अगर प्राचीन यूनानी विचारक प्लेटो और अरस्तु के विचारों को पढ़ा जाए तो प्लेटो का न्याय विषयक सिद्धांत मनुष्यों के तीन गुणों साहस,बुद्धि और वासना पर ही आधारित है। अरस्तु का भी ऐसा ही विचार है,अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के गुण और स्वभाव में भिन्नता एक सार्वभौमिक सत्य है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का वर्गीकरण केवल भारत में है बल्कि दुनिया के हर कोने में ऐसी प्रवृति पायी जाती है,हालाँकि वे हिन्दू नहीं हैं।
डॉ. आंबेडकर अपने चिंतन में सबसे बड़ी भूल 'शूद्र की स्थिति' को लेकर करते हैं और आज उसी को आधार मानकर समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है।
दो वाक्यांशों में अंतर समझना बहुत ही जरूरी है,"मनुस्मृति 'कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था' का बात करता है जो आज प्रचलित नहीं है,आज 'जन्म पर आधारित जाति-व्यवस्था' है। दोनों में जमीन आसमां का अंतर में और दोनों को एक नहीं माना जा सकता।"
राजनीतिक कारणों से विकसित की गई अनुसूचित जातियाँ,जनजातियाँ,दलितों को मनु की शूद्र वर्ण से कोई संबंध नहीं है। आज जब वर्ण-व्यवस्था है ही नहीं तो सहीं अर्थों में न कोई ब्राह्मण,न कोई शूद्र और न ही कोई दलित है। आज हिन्दू समाज में सब बराबर है,कोई उंच-नीच नहीं और कोई अगड़ा-पिछड़ा नहीं।
अतः आज शूद्र के नाम पर किसी को भी मनुस्मृति के विरुद्ध आंदोलन करने का अधिकार नहीं। मनुस्मृति विरोध पूर्णतया अनुचित,असंगत और अन्यायपूर्ण है।
मनु के वर्ण व्यवस्था के अनुसार सभी वर्ण एक-दूसरे के पूरक एवं सहयोगी है,न कि विरोधी। मनु का शूद्र उपेक्षित नहीं है। उसे ब्राह्मण बनने का पूर्ण अधिकार है।
मनु का कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के अनुकूल मानना डॉ. आंबेडकर का सबसे बड़ी भूल है जो मंदिर में जाने से रोके जाने के तात्कालिक प्रभाव और उतावलेपन को दिखाता है। अगर वे हिन्दू समाज में समय के साथ उत्पन्न बुराइयों को दूर करके एक 'सशक्त समाज' का निर्माण करने के लिए आंदोलन करते तो उनके लिए एक अच्छा विकल्प होता। बौद्ध धर्म को अपनाकर उन्होंने अपनी संकीर्णता का ही परिचय दिया है।
आज स्थिति यह हो गयी है कि बौद्ध धर्म स्वीकार किये दलित भी आरक्षण का लाभ उठा हैं,जब इनको बराबरी का अधिकार एक भिन्न अधिकार एक भिन्न धर्म में मिल गया है तो 'आरक्षण की वैशाखी' की जरुरत क्यों ? यहाँ दोहरी नीति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।
सन्दर्भ सूची -
1. मनुस्मृति
2. मनुस्मृति और डॉ. आंबेडकर - डॉ. कृष्ण वल्लभ पालीवाल
3. भारतीय राजनीतिक विचारक - ओ. पी. गाबा
4. राजनीतिक विचारों का इतिहास(भाग-1) - जे. पी. सूद
5. आधुनिक भारत का इतिहास - विपिन चंद्रा
6. भारतीय संविधान - डी. डी. वसु
7. संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह दिनकर
मनुस्मृति भारत की न्याय व्यवस्था का ग्रन्थ था , जिसको अंग्रेजो ने अपने हिसाब से बहुत सारी घटिया बाते डाल दी ताकि वोह कई आने वाली पीढियों तक भारत को मानसिक गुलाम बना सके।
राजीव दिक्षित
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सुना है , मनुस्मृति को जलाया गया !
! उलटे ,जलाने से हुआ क्या ? क्या पुस्तक का अस्तित्व मिट गया ? नहीं ! चलो, अच्छा ही हुआ की पुस्तक अभी ओर चर्चा में आ गयी ! क्योंकि यकीन से कह सकता हूँ की जलाने वालो ने इसे नहीं पढ़ा होगा ! अगर थोडा भी पढ़ा होता तो उस पर बात करते, जलाते नहीं !
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जाने राजीव भाई क्या बोलते है मनुस्मृति के बरे मे,
क्योंकि हमारे यहाँ धर्म के 10 लक्षण है जो धारण करे वो धार्मिक है ,यहाँ मंदिर मे आकर घंटा बजाना कर्मकांड है धर्म नहीं ! धर्म तो धारण करने वाले 10 लक्षणो के आधार पर चलता है वो 10 लक्षण (मनुसमृति) मे बहुत स्पष्ट दिये है की धर्म क्या है !भारतीयता क्या है इसको पहचानते हों, कम से कम धर्म के दस लक्षण उन्हें मालूम हो( धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शौच (स्वच्छता), इन्द्रियों को वश मे रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना; ये धर्म के दस लक्षण हैं।) जो व्यक्ति उसको धारण करे वो धार्मिक है वो हिन्दू हो मुसलमान हो ईसाई हो पारसी हो इससे कोई लेना देना नहीं !! जो उन लक्षणो को धारण करे वो धार्मिक है ये हमारी परिभाषा है
जो व्यक्ति उसको धारण करे वो धार्मिक है वो हिन्दू हो मुसलमान हो ईसाई हो पारसी हो इससे कोई लेना देना नहीं !! जो उन लक्षणो को धारण करे वो धार्मिक है ये हमारी परिभाषा है !
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(मनुसमृति) मे बिलकुल स्पष्ट परिभाषा है और इतनी सुंदर परिभाषा है की कोई दे नहीं सकता और पूरे ब्रह्मांड के लिए वही परिभाषा है केवल मनुष्य के लिए नहीं ,पशु पक्षी ,कीड़े मकोड़े ,चींटी हाथी सबके लिए वही परिभाषा है ! तो हमारे यहाँ की परिभाषा के अनुसार धर्म के निरपेक्ष आप चले जाए तो ये दुनिया ही नहीं चलेगी तो भारत मे तो धर्मनिरपेक्ष कुछ नहीं हो सकता यहाँ कुछ हो सकता है तो वो पंथनिरपेक्ष हो सकता है ,की सरकार पंथनिरपेक्ष है इस पंथ का भी नहीं मानती उस पंथ का भी नहीं मानती ! संप्रदाय निरपेक्ष हो सकता है की सरकार इस संप्रदाय का भी नहीं मानती ! उस संप्रदाय का भी नहीं मानती ! तो धर्मनिरपेक्ष होना तो संभव ही नहीं है भारत के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया मे किसी के लिए भी नहीं !!
ईसाईयत भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकती है क्योंकि डूब जाएगा सब कुछ ! इस्लाम भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता क्योंकि खत्म हो जाएगा सब कुछ ! धर्मनिरपेक्ष तो दुनिया मे कुछ नहीं हो सकता है जो है वो धर्म के सापेक्ष ही हो सकता है ! निरपेक्ष तो कुछ नहीं हो सकता ! पंथ निरपेक्ष कुछ हो सकता है संप्रदाय निरपेक्ष कुछ हो सकता है ! लेकिन हमारे नेताओ को तो ये बात करते भी डर लगता है या तो डरपोक है या मूर्ख है !!
मुझे लगता है उनमे मूर्खता की पराकाष्ठा ज्यादा है ! थोड़ी कमजोरी हो सकती है लेकिन मूर्खता की पराकाष्ठा ज्यादा है !!
(मनुसमृति) मे बिलकुल स्पष्ट परिभाषा है
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मनुस्मृति पर डॉ. आंबेडकर के विचार का कठोर आलोचना
मनुस्मृति का मूल विषय वेदानुकूल वर्णाश्रम धर्म का विधि-विधान है। इसमें संपूर्ण मानव धर्म है। दूसरे शब्दों में मनुस्मृति एक कानूनी समाजशास्त्र है। इसमें एक ओर मनुष्य के आचरण को लेकर मर्यादा और नैतिक कर्तव्य दिए गए हैं,तो दूसरी ओर समाज व्यवस्था को चलाने के लिए क़ानून,दण्ड,प्रायश्चित आदि का भी समावेश है। एक तरह से कहा जाए तो आधुनिक समाज के संविधान के भाँती मनुस्मृति प्राचीन समाज में 'क़ानून का शासन' स्थापित करता था,जिसके बदौलत राजा और प्रजा दोनों को ही अनुशासित किया जाता था।
आधुनिक भारत के एक दलित विचारक डॉ. आंबेडकर द्वारा इस किताब की तीखी आलोचना की गयी,गुस्से में आकर उनके द्वारा जला भी दिया गया,इन दिनों उसी का प्रचलन हो रहा है और जगह-जगह 'मनुस्मृति' को समझे बिना जलाने की ड्रामेवाजी चल रही है।
डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति पर जो भी विचार व्यक्त कियें हैं,उसमें उन्होंने 475 श्लोकों का बार-बार प्रयोग किया,जिनमें से अधिकांश मिलावटी है,अगर इसे निकाल दिया जाए तो मनु के चिंतन और आंबेडकर के चिंतन में कोई मतभेद नहीं रह जाता।
अपने किताब 'शूद्रों की खोज' में आंबेडकर लिखते हैं,"मैं संस्कृत भाषा का पारंगत नहीं हूँ तो अपनी इस कमजोरी को मैं स्वीकार करता हूँ।"
इसीकारण दुर्भाग्यवश डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति के विषय में वेद विरोधी मैक्समूलर द्वारा संपादित और जॉर्ज बूहलर द्वारा अंगरेजी में अनुवादित मनुस्मृति के आधार पर अपना विचार लिख दिया,जिससे अनेक भ्रांतियाँ हुयी। मैक्समूलर और बूहलर के भारतीय संस्कृति विरोध के पूर्वाग्रह को कई वामपंथी इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं।
मनु के धर्मशास्त्र का मुख्य विषय वर्णाश्रम धर्म है,लेकिन डॉ. आंबेडकर द्वारा दुर्भाग्य से वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के रूप में समझ लिया जाता है। इसपर वे कहते हैं,'मनु ने चारों वर्णों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं क्यों दी ? एक समान क्यों नहीं दी ?"
यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि मनुस्मृति में सभी मनुष्यों के लिए एक सामान्य धर्म,और प्रत्येक वर्ण के लिए उसका विशेष धर्म कहा गया है। जो स्वाभाविक है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य के गुण,कर्म और स्वभाव में भिन्नता पायी जाती है। सभी मनोवैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं और आधुनिक शोधों द्वारा इसे प्रमाणित भी किया जा चुका है कि सभी मनुष्य में भिन्नता पायी जाती है।
अगर प्राचीन यूनानी विचारक प्लेटो और अरस्तु के विचारों को पढ़ा जाए तो प्लेटो का न्याय विषयक सिद्धांत मनुष्यों के तीन गुणों साहस,बुद्धि और वासना पर ही आधारित है। अरस्तु का भी ऐसा ही विचार है,अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के गुण और स्वभाव में भिन्नता एक सार्वभौमिक सत्य है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का वर्गीकरण केवल भारत में है बल्कि दुनिया के हर कोने में ऐसी प्रवृति पायी जाती है,हालाँकि वे हिन्दू नहीं हैं।
डॉ. आंबेडकर अपने चिंतन में सबसे बड़ी भूल 'शूद्र की स्थिति' को लेकर करते हैं और आज उसी को आधार मानकर समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है।
दो वाक्यांशों में अंतर समझना बहुत ही जरूरी है,"मनुस्मृति 'कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था' का बात करता है जो आज प्रचलित नहीं है,आज 'जन्म पर आधारित जाति-व्यवस्था' है। दोनों में जमीन आसमां का अंतर में और दोनों को एक नहीं माना जा सकता।"
राजनीतिक कारणों से विकसित की गई अनुसूचित जातियाँ,जनजातियाँ,दलितों को मनु की शूद्र वर्ण से कोई संबंध नहीं है। आज जब वर्ण-व्यवस्था है ही नहीं तो सहीं अर्थों में न कोई ब्राह्मण,न कोई शूद्र और न ही कोई दलित है। आज हिन्दू समाज में सब बराबर है,कोई उंच-नीच नहीं और कोई अगड़ा-पिछड़ा नहीं।
अतः आज शूद्र के नाम पर किसी को भी मनुस्मृति के विरुद्ध आंदोलन करने का अधिकार नहीं। मनुस्मृति विरोध पूर्णतया अनुचित,असंगत और अन्यायपूर्ण है।
मनु के वर्ण व्यवस्था के अनुसार सभी वर्ण एक-दूसरे के पूरक एवं सहयोगी है,न कि विरोधी। मनु का शूद्र उपेक्षित नहीं है। उसे ब्राह्मण बनने का पूर्ण अधिकार है।
मनु का कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के अनुकूल मानना डॉ. आंबेडकर का सबसे बड़ी भूल है जो मंदिर में जाने से रोके जाने के तात्कालिक प्रभाव और उतावलेपन को दिखाता है। अगर वे हिन्दू समाज में समय के साथ उत्पन्न बुराइयों को दूर करके एक 'सशक्त समाज' का निर्माण करने के लिए आंदोलन करते तो उनके लिए एक अच्छा विकल्प होता। बौद्ध धर्म को अपनाकर उन्होंने अपनी संकीर्णता का ही परिचय दिया है।
आज स्थिति यह हो गयी है कि बौद्ध धर्म स्वीकार किये दलित भी आरक्षण का लाभ उठा हैं,जब इनको बराबरी का अधिकार एक भिन्न अधिकार एक भिन्न धर्म में मिल गया है तो 'आरक्षण की वैशाखी' की जरुरत क्यों ? यहाँ दोहरी नीति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।
सन्दर्भ सूची -
1. मनुस्मृति
2. मनुस्मृति और डॉ. आंबेडकर - डॉ. कृष्ण वल्लभ पालीवाल
3. भारतीय राजनीतिक विचारक - ओ. पी. गाबा
4. राजनीतिक विचारों का इतिहास(भाग-1) - जे. पी. सूद
5. आधुनिक भारत का इतिहास - विपिन चंद्रा
6. भारतीय संविधान - डी. डी. वसु
7. संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह दिनकर

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