Friday, 8 April 2016

मनुस्मृती शोध ....धारणा

भारत मे दो प्रति है मनुस्मृति कि कूच मे विक्षेप है ओ तोड मरोड कर पेश कि गायी है
मनुस्मृति भारत की न्याय व्यवस्था का ग्रन्थ था , जिसको अंग्रेजो ने अपने हिसाब से बहुत सारी घटिया बाते डाल दी ताकि वोह कई आने वाली पीढियों तक भारत को मानसिक गुलाम बना सके।
राजीव दिक्षित
**************************************************************************
सुना है , मनुस्मृति को जलाया गया ! 
! उलटे ,जलाने से हुआ क्या ? क्या पुस्तक का अस्तित्व मिट गया ? नहीं ! चलो, अच्छा ही हुआ की पुस्तक अभी ओर चर्चा में आ गयी ! क्योंकि यकीन से कह सकता हूँ की जलाने वालो ने इसे नहीं पढ़ा होगा ! अगर थोडा भी पढ़ा होता तो उस पर बात करते, जलाते नहीं !
****************************************************************************
जाने राजीव भाई क्या बोलते है मनुस्मृति के बरे मे,
क्योंकि हमारे यहाँ धर्म के 10 लक्षण है जो धारण करे वो धार्मिक है ,यहाँ मंदिर मे आकर घंटा बजाना कर्मकांड है धर्म नहीं ! धर्म तो धारण करने वाले 10 लक्षणो के आधार पर चलता है वो 10 लक्षण (मनुसमृति) मे बहुत स्पष्ट दिये है की धर्म क्या है !भारतीयता क्या है इसको पहचानते हों, कम से कम धर्म के दस लक्षण उन्हें मालूम हो( धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शौच (स्वच्छता), इन्द्रियों को वश मे रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना; ये धर्म के दस लक्षण हैं।) जो व्यक्ति उसको धारण करे वो धार्मिक है वो हिन्दू हो मुसलमान हो ईसाई हो पारसी हो इससे कोई लेना देना नहीं !! जो उन लक्षणो को धारण करे वो धार्मिक है ये हमारी परिभाषा है
जो व्यक्ति उसको धारण करे वो धार्मिक है वो हिन्दू हो मुसलमान हो ईसाई हो पारसी हो इससे कोई लेना देना नहीं !! जो उन लक्षणो को धारण करे वो धार्मिक है ये हमारी परिभाषा है !
*****************************************************************************
(मनुसमृति) मे बिलकुल स्पष्ट परिभाषा है और इतनी सुंदर परिभाषा है की कोई दे नहीं सकता और पूरे ब्रह्मांड के लिए वही परिभाषा है केवल मनुष्य के लिए नहीं ,पशु पक्षी ,कीड़े मकोड़े ,चींटी हाथी सबके लिए वही परिभाषा है ! तो हमारे यहाँ की परिभाषा के अनुसार धर्म के निरपेक्ष आप चले जाए तो ये दुनिया ही नहीं चलेगी तो भारत मे तो धर्मनिरपेक्ष कुछ नहीं हो सकता यहाँ कुछ हो सकता है तो वो पंथनिरपेक्ष हो सकता है ,की सरकार पंथनिरपेक्ष है इस पंथ का भी नहीं मानती उस पंथ का भी नहीं मानती ! संप्रदाय निरपेक्ष हो सकता है की सरकार इस संप्रदाय का भी नहीं मानती ! उस संप्रदाय का भी नहीं मानती ! तो धर्मनिरपेक्ष होना तो संभव ही नहीं है भारत के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया मे किसी के लिए भी नहीं !!
ईसाईयत भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकती है क्योंकि डूब जाएगा सब कुछ ! इस्लाम भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता क्योंकि खत्म हो जाएगा सब कुछ ! धर्मनिरपेक्ष तो दुनिया मे कुछ नहीं हो सकता है जो है वो धर्म के सापेक्ष ही हो सकता है ! निरपेक्ष तो कुछ नहीं हो सकता ! पंथ निरपेक्ष कुछ हो सकता है संप्रदाय निरपेक्ष कुछ हो सकता है ! लेकिन हमारे नेताओ को तो ये बात करते भी डर लगता है या तो डरपोक है या मूर्ख है !!
मुझे लगता है उनमे मूर्खता की पराकाष्ठा ज्यादा है ! थोड़ी कमजोरी हो सकती है लेकिन मूर्खता की पराकाष्ठा ज्यादा है !!

(मनुसमृति) मे बिलकुल स्पष्ट परिभाषा है

http://eksochjoalagho.blogspot.ae/2016/03/manusmriti-anbedkr-criticism.html?m=1
मनुस्मृति पर डॉ. आंबेडकर के विचार का कठोर आलोचना
मनुस्मृति का मूल विषय वेदानुकूल वर्णाश्रम धर्म का विधि-विधान है। इसमें संपूर्ण मानव धर्म है। दूसरे शब्दों में मनुस्मृति एक कानूनी समाजशास्त्र है। इसमें एक ओर मनुष्य के आचरण को लेकर मर्यादा और नैतिक कर्तव्य दिए गए हैं,तो दूसरी ओर समाज व्यवस्था को चलाने के लिए क़ानून,दण्ड,प्रायश्चित आदि का भी समावेश है। एक तरह से कहा जाए तो आधुनिक समाज के संविधान के भाँती मनुस्मृति प्राचीन समाज में 'क़ानून का शासन' स्थापित करता था,जिसके बदौलत राजा और प्रजा दोनों को ही अनुशासित किया जाता था।

आधुनिक भारत के एक दलित विचारक डॉ. आंबेडकर द्वारा इस किताब की तीखी आलोचना की गयी,गुस्से में आकर उनके द्वारा जला भी दिया गया,इन दिनों उसी का प्रचलन हो रहा है और जगह-जगह 'मनुस्मृति' को समझे बिना जलाने की ड्रामेवाजी चल रही है।

डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति पर जो भी विचार व्यक्त कियें हैं,उसमें उन्होंने 475 श्लोकों का बार-बार प्रयोग किया,जिनमें से अधिकांश मिलावटी है,अगर इसे निकाल दिया जाए तो मनु के चिंतन और आंबेडकर के चिंतन में कोई मतभेद नहीं रह जाता।

अपने किताब 'शूद्रों की खोज' में आंबेडकर लिखते हैं,"मैं संस्कृत भाषा का पारंगत नहीं हूँ तो अपनी इस कमजोरी को मैं स्वीकार करता हूँ।"

इसीकारण दुर्भाग्यवश डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति के विषय में वेद विरोधी मैक्समूलर द्वारा संपादित और जॉर्ज बूहलर द्वारा अंगरेजी में अनुवादित मनुस्मृति के आधार पर अपना विचार लिख दिया,जिससे अनेक भ्रांतियाँ हुयी। मैक्समूलर और बूहलर के भारतीय संस्कृति विरोध के पूर्वाग्रह को कई वामपंथी इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं।

मनु के धर्मशास्त्र का मुख्य विषय वर्णाश्रम धर्म है,लेकिन डॉ. आंबेडकर द्वारा दुर्भाग्य से वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के रूप में समझ लिया जाता है। इसपर वे कहते हैं,'मनु ने चारों वर्णों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं क्यों दी ? एक समान क्यों नहीं दी ?"

यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि मनुस्मृति में सभी मनुष्यों के लिए एक सामान्य धर्म,और प्रत्येक वर्ण के लिए उसका विशेष धर्म कहा गया है। जो स्वाभाविक है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य के गुण,कर्म और स्वभाव में भिन्नता पायी जाती है। सभी मनोवैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं और आधुनिक शोधों द्वारा इसे प्रमाणित भी किया जा चुका है कि सभी मनुष्य में भिन्नता पायी जाती है।

अगर प्राचीन यूनानी विचारक प्लेटो और अरस्तु के विचारों को पढ़ा जाए तो प्लेटो का न्याय विषयक सिद्धांत मनुष्यों के तीन गुणों साहस,बुद्धि और वासना पर ही आधारित है। अरस्तु का भी ऐसा ही विचार है,अर्थात कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के गुण और स्वभाव में भिन्नता एक सार्वभौमिक सत्य है। ऐसा नहीं है कि इस तरह का वर्गीकरण केवल भारत में है बल्कि दुनिया के हर कोने में ऐसी प्रवृति पायी जाती है,हालाँकि वे हिन्दू नहीं हैं।

डॉ. आंबेडकर अपने चिंतन में सबसे बड़ी भूल 'शूद्र की स्थिति' को लेकर करते हैं और आज उसी को आधार मानकर समाज में भ्रम फैलाया जा रहा है।

दो वाक्यांशों में अंतर समझना बहुत ही जरूरी है,"मनुस्मृति 'कर्म पर आधारित वर्ण-व्यवस्था' का बात करता है जो आज प्रचलित नहीं है,आज 'जन्म पर आधारित जाति-व्यवस्था' है। दोनों में जमीन आसमां का अंतर में और दोनों को एक नहीं माना जा सकता।"

राजनीतिक कारणों से विकसित की गई अनुसूचित जातियाँ,जनजातियाँ,दलितों को मनु की शूद्र वर्ण से कोई संबंध नहीं है। आज जब वर्ण-व्यवस्था है ही नहीं तो सहीं अर्थों में न कोई ब्राह्मण,न कोई शूद्र और न ही कोई दलित है। आज हिन्दू समाज में सब बराबर है,कोई उंच-नीच नहीं और कोई अगड़ा-पिछड़ा नहीं।

अतः आज शूद्र के नाम पर किसी को भी मनुस्मृति के विरुद्ध आंदोलन करने का अधिकार नहीं। मनुस्मृति विरोध पूर्णतया अनुचित,असंगत और अन्यायपूर्ण है।

मनु के वर्ण व्यवस्था के अनुसार सभी वर्ण एक-दूसरे के पूरक एवं सहयोगी है,न कि विरोधी। मनु का शूद्र उपेक्षित नहीं है। उसे ब्राह्मण बनने का पूर्ण अधिकार है।

मनु का कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था को आज के जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के अनुकूल मानना डॉ. आंबेडकर का सबसे बड़ी भूल है जो मंदिर में जाने से रोके जाने के तात्कालिक प्रभाव और उतावलेपन को दिखाता है। अगर वे हिन्दू समाज में समय के साथ उत्पन्न बुराइयों को दूर करके एक 'सशक्त समाज' का निर्माण करने के लिए आंदोलन करते तो उनके लिए एक अच्छा विकल्प होता। बौद्ध धर्म को अपनाकर उन्होंने अपनी संकीर्णता का ही परिचय दिया है।

आज स्थिति यह हो गयी है कि बौद्ध धर्म स्वीकार किये दलित भी आरक्षण का लाभ उठा हैं,जब इनको बराबरी का अधिकार एक भिन्न अधिकार एक भिन्न धर्म में मिल गया है तो 'आरक्षण की वैशाखी' की जरुरत क्यों ? यहाँ दोहरी नीति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

सन्दर्भ सूची -
1. मनुस्मृति
2. मनुस्मृति और डॉ. आंबेडकर - डॉ. कृष्ण वल्लभ पालीवाल
3. भारतीय राजनीतिक विचारक - ओ. पी. गाबा
4. राजनीतिक विचारों का इतिहास(भाग-1) - जे. पी. सूद
5. आधुनिक भारत का इतिहास - विपिन चंद्रा
6. भारतीय संविधान - डी. डी. वसु
7. संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह दिनकर

धर्मवीर शंभू राजे का वीर बलिदान


देश धरम पर मिटनेवाला शेर शिवा का छावा था ।महापराक्रमी परमप्रतापी, एक ही शंभू राजा था ।।


आज वीर शंभू राजे के बलिदान दिवस हम याद करे 

मित्रो ,आज शेर शिवाजी महाराज वीर योद्धा सुपुत्र छावा संभाजी महाराज का बलिदान दिवस.....बहुत बडा त्याग किया है इस छावा ने
=====================================
मित्रो
अपने धर्म के लिये बडा त्याग किया है आपके रोंगटे खडे होंगे अगर आप सुनोगे इनके वीर बलिदान कि कहाणी पहले तो इंनकी वीरता कि कहाणी बताऊ गा आपको

"..........नऊ बरस ....तब्बल नऊ बरस इस राजाने आपनी मृत्यू को तलवार कि नोक पर सवार के रखा ,सह्यगिरी कि पर्वत राजीवोंमे ये राजा ९ साल तक तुफान कि मुघल सल्तनत पर काल तरह मंडराता रहा १२० लढाई या कि एक भी लढाई में हार नाही ना संधी कि ......अजेय अजिंक्य राजा कहकर इतिहास को भी इस राजा कि दखल लेणी पडी ऐसे राजा के बारे में थोडा ................

*औरंगे को २७ वर्ष उत्तर हिंदुस्थान से दूर रखने वाला ...इसी समय उत्तर में शीख ,जाट छत्रसाल ....जैसी सत्तावोन्का उदय हुवा क्यूंकी इस समय उत्तर भारत शांत था

धर्मवीर छत्रपति संभाजी राजे भोसले या शम्भाजी (1657-1689) मराठा सम्राट और छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारी । उस समय मराठाओं के सबसे प्रबल शत्रु मुगल बादशाह औरंगजेब बीजापुर और गोलकुण्डा का शासन हिन्दुस्तान से समाप्त करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही । सम्भाजी अपनी शौर्यता के लिये काफी प्रसिद्ध थे । सम्भाजी ने अपने कम समय के शासन काल मे १२० युद्ध किये , और इसमे एक प्रमुख बात ये थी कि उनकी सेना एक भी युद्ध मे पराभूत नहीं हुई । इस तरह का पराक्रम करने वाले वह शायद एकमात्र योद्धा होंगे। उनके पराक्रम की वजह से परेशान हो कर दिल्ली के बादशाह औरंगजेब ने कसम खायी थी के जब तक छत्रपती संभाजी पकडे नहीं जायेंगे, वो अपना किमोंश सर पर नहीं चढ़ाएगा। इतने बड़े साहसी और उत्तम शासक होने के बावजूद कुछ अंतर्गत विरोधको के कारन उनका चरित्र एक चरित्रहीन तथा व्यसनी राजा का दिखाया गया है। यह काफी अचम्बे की बात है के छत्रपति संभाजी महाराज के बारे में लिखी गयी बाते ये उनके मृत्यु के पश्चात 100 साल गुजरने पर लिखी गयी। और यह लिखने वाले व्यक्ति शिर्के खानदान के वंशज थे जिनको वतनदारी देने से महाराज ने इन्कार किया था [ वतनदारी एक ऐसी प्रथा थी जिसमे सरदार को एक नियोजित प्रांत में से कर वसूल करने का अधिकार दिया जाता था। यह प्रथा छत्रपति शिवाजी महाराज ने बंद करवाई थी क्योंकि आम जनता और किसान इस प्रथा से त्रस्त थी।]

छत्रपति संभाजी (जन्म, 1657; मृत्यु, 1689) नौ वर्ष की अवस्था में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रसिद्ध आगरा यात्रा में यह साथ गया था। औरंगजेब के बंदीगृह से निकल, छत्रपति शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र वापस लौटने पर, मुगलों से समझौते के फलस्वरूप, संभाजी मुगल सम्राट् द्वारा राजा के पद तथा पंचहजारी मंसब से विभूषित हुए । औरंगाबाद की मुगल छावनी में, मराठा सेना के साथ, उसकी नियुक्ति हुई (1668)। युगप्रवर्तक राजा के पुत्र रहते उनको यह नौकरी मान्य नहीं थी। किन्तु स्वराज्य स्थापना की शुरू के दिन होने के कारन और पिता के आदेश के पालन हेतु केवल 9 साल के उम्र में ही इतना जिम्मेदारी का लेकिन अपमान जनक कार्य उन्होंने धीरज से किया। उन्होंने अपने उम्र के केवल 14 साल में उन्होंने बुधाभुषणम, नखशिख, नायिकाभेद तथा सातशातक यह तीन संस्कृत ग्रंथ लिखे थे। छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के बाद स्थापित अष्टप्रधान मंत्रिमंडल में से कुछ लोगों की राजकारण के वजह से यह संवेदनशील युवराज काफी क्षतिग्रस्त हुए थे। पराक्रमी होने के बावजूद उन्हें अनेक लड़ाईयोंसे दूर रखा गया। स्वभावत: संवेदनशील रहनेवाले संभाजी अपना पराक्रम दिखाने की कोशिश में मुघल सेना से जा मिले (16 दिसंबर, 1678). किन्तु कुछ ही समय में जब उनको अपनी गलती समझ आई तब वो वहां से पुन: स्वराज्य में आये। मगर इस प्रयास में वो अपने पुत्र शाहू, पत्नी रानी येसूबाई और बहेन गोदावरी उनको अपने साथ लेन में असफल रहे। छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु (20 जुलाई, 1680) के बाद कुछ लोगों ने संभाजी के अनुज राजाराम को सिंहासनासीन करने का प्रयत्न किया। किन्तु सेनापति मोहिते के रहते यह कारस्थान नाकामयाब हुआ और 10 जनवरी, 1681 को संभाजी महाराज का विधिवत्‌ राज्याभिषेक हुआ। इसी वर्ष औरंगजेब के विद्रोही पुत्र अकबर ने दक्षिण भाग कर संभाजी का आश्रय ग्रहण किया। अकेले मुग़ल, पोर्तुगीज, अंग्रेज़ तथा अन्य शत्रुओं के साथ लड़ने के साथ ही उन्हें अंतर्गत शत्रुओंसे भी लड़ना पड़ा। राजाराम को छत्रपति बनाने में असफल रहने वाले राजाराम समर्थकोने औरंगजेब के पुत्र अकबर से राज्य पर आक्रमण कर के उसे मुग़ल साम्राज्य का अंकित बनाने की गुजारिश करने वाला पत्र लिखा। किन्तु छत्रपति संभाजी के पराक्रम से परिचित और उनका आश्रित होने के कारन अकबर ने वह पत्र छत्रपति संभाजी को भेज दिया। इस राजद्रोह से क्रोधित छत्रपति संभाजीने अपने सामंतो को मृत्युदंड दिया। तथापि उन में से एक बालाजी आवजी नामक सामंत की समाधी भी उन्होंने बनायीं जिनके माफ़ी का पत्र छत्रपति संभाजी को उन सामंत के मृत्यु पश्चात मिला । 1683 में उसने पुर्तगालियों को पराजित किया। इसी समय वह किसी राजकीय कारन से संगमनेर में रहे थे। जिस दिन वो रायगड के लिए प्रस्थान करने वाले थे उसी दिन कुछ ग्रामास्थोने अपनी समस्या उन्हें अर्जित करनी चाही। जिसके चलते छत्रपति संभाजी महाराज ने अपने साथ केवल 200 सैनिक रख के बाकि सेना को रायगड भेज दिया। उसी वक्त उनके साले गनोजी शिर्के, जिनको उन्होंने वतनदारी देने से इन्कार किया था, मुग़ल सरदार इन्सिलब खान के साथ गुप्त रस्ते से 5000 के फ़ौज के साथ वहां पहुंचे। यह वह रास्ता था जो सिर्फ मराठाओं को पता था।

इसलिए संभाजी महाराज को कभी नहीं लगा था के शत्रु इस और से आ सकेगा। उन्होंने लड़ने का प्रयास किया किन्तु इतनी बड़ी फ़ौज के सामने 200 सैनिकों का प्रतिकार काम कर न पाया और अपने मित्र तथा एकमात्र सलाहकार कविकलश के साथ वह बंदी बना लिए गए (1 फरबरी, 1689)। दोनों को मुसलमान बनाने के लिए औरंगजेब ने कई कोशिशे की। किन्तु धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज और कवी कलशने धर्म परिवर्तन से इनकार कर दिया। औरंगजेब ने दोनों की जुबान कटवा दी, आँखें निकाल दी किन्तु शेर छत्रपति शिवाजी महाराज के इस सुपुत्र ने अंत तक धर्म का साथ नहीं छोड़ा। 11 मार्च, 1689 हिन्दू नववर्ष दिन को दोनों के शरीर के तुकडे कर के औरंगजेब ने हत्या कर दी। किन्तु ऐसा कहते है की हत्या पूर्व औरंगजेब ने छत्रपति संभाजी महाराज से कहा के मेरे 4 पुत्रों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता तो सारा हिन्दुस्थान कब का मुग़ल सल्तनत में समाया होता। जब छत्रपति संभाजी महाराज के तुकडे तुलापुर की नदी में फेंकें गए तो उस किनारे रहने वाले लोगों ने वो इकठ्ठा कर के सिला के जोड़ दिए [ इन लोगों को आज " शिवले " इस नाम से जाना जाता है ] जिस के उपरांत उनका विधिपूर्वक अंत्यसंस्कार किया।

औरंगजेब ने सोचा था की मराठी साम्राज्य छत्रपति संभाजी महाराज के मृत्यु पश्चात ख़त्म हो जाएगा।

छत्रपति संभाजी महाराज के हत्या की वजह से सारे मराठा एक साथ आकर लड़ने लगे। अत: औरंगजेब को दक्खन में ही प्राणत्याग करना पड़ा। उसका दक्खन जितने का सपना इसी भूमि में दफन हो गया।